वर्तमान में विधवा-विधुर की व्यथा

संसार रूपी गाड़ी को चलाने के लिये दाम्पत्य जीवन की खुशहाली के लिये पाणिग्रहण संस्कार विधि विधान से भारतीय संस्कृति के अनुसार अपना जीवन यापन, दाम्पत्य सुख वैवाहिक सन्बन्ध आयु कर्म के अनुसार वर-वधु से सन्तानोंत्पतिति के बाद माता-पिता, सास
ससुर बच्चों की परवरिश परिवार की जिम्मेदारी या समाज में अपनी प्रतिष्ठा कायम रखना बच्चों की समय पर शादीयँ, पढ़ाई, रोजगार एवं रिश्तों मे प्रेम भाव रखना यही अपना धर्म तथा लौकिक सुख माना जाता तथा यह संसार का नियम है कि जीवन रूपी गाड़ी को नर-नारी से पूर्ण आयु कर मनुष्य जीवन सफल बनाने का नाम ही संसार माना ऐसा कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी

लेकिन विधाता की लेखनी अलग है कब किसका मरण हो जाये यह कोई नही जानता। कोई रोग ग्रस्त होकर कोई दुर्घटना से कोई अल्प आयु से देह परिवर्तन करने से परिवार मोह के वंशीभूत चिन्ता-शोक करता है किन्नु आयु कर्म के बारे में विज्ञान, वैद्यराज भी अपनी पूरी कोशिश के बाद “विधाता पर विधि को कोई नही टाल सकता” कह देते है।

किसी ने ठीक कहा है मृत्यु का कोई भरोसा नही है,
एक सेठ ली लिखते लिखते कलम हाथ में धरी रही।
यमराज का आया बुलावा प्यारी काया पड़ी रही।।

यह अनादिकाल से जन्म, मरण विधि पर आधारित है। प्राचीन समय में युद्ध के दौरान राजा की मृत्यु के समाचार रानी सुनती शोक मे डूब जाती। क्योंकि पतिव्रता नारी अपना धर्म निभाते हुए अपनी आयु पर्ण करती। कहीं बार रानी युद्ध में अपने प्राण न्यौछावर कर देती। राजा अकेला विलाप करता। कहीं बार अपनी संतान के “प्राण पखेंरू उड़ जाते” यहीं संसार है।

लेकिन वर्तमान परिरिथति भौतिकता की चकाचौध में कारोबार, खानपान की अनियमित्ता प्रदुषित वातावरण, तनावपूर्ण जिन्दगी, नशे की लत या अचानक रोग्रस्त से वर का या वधु का अचानक मृत्यु को प्राप्त होना बहुत ही चिंताजनक स्थिति पैदा हो रही है। आजकल देखा कि संस्कारों की कमी, संयुक्त परिवार का टूटना, एकल परिवार में रहना, वात्सल्यता प्रेम आपनी कदुता से अकेलापन शेष आयु को पूर्ण करना कठिन सा लग रहा है। अमी-अभी वायु प्रदुषण, जल प्रदुषण तथा खानपान में शुद्धता की कमी से आयु पूर्ण करना कठिन सा लग रहा है। साथ ही प्राकृतिक प्रकोपो में आंधी, तूफान, भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि से जिन्दगी में तनाव रोग से दुर्लभ मानव जीवन जल्दी समाप्त हो रहा है। महामारी के प्रकोप में कभी आदमी मर जाता है तो औरत अकेली रह जाती है। कभी औरत मर जाती है तो आदमी अकेला रह जाता है जिसे विधवा-विधुर कहकर उनकी पीड़ा को सुने समझने पर वर्तमान में एक चिंता का विषय है।

आदमी जिन्दगी भर परिवार को सुचारू रूप से चलाने के लिए मेहनत करता है। रोजगार प्राप्त करता है पूरे परिवार को वह सुखी देखना चाहता है। स्वयं सर्दी, गर्मी, बरसात में अपने तन को दॉव पर लगाकर कमी परिवार को महसुस नही होने देता कि आदमी कितना श्रम परिवार के लिए करता है उसी प्रकार औरत स्वयं के सुख को छोड़कर शादी के बाद अपने पति संतान की सेवा में पुरी जिदंगी परोपकार में बिता देती है। वह चाहती है मेरा पति सुखी रहे भरपेट भोजन करे संतान को तंदुरस्त रखने के लिये खाने पिने में ध्यान के साथ सर्दी , गर्मी, बरसात में सभी तकलीफे आने पर भी सबके सुख की चिंता करती है। यह संस्कार समाज में मान प्रतिष्ठा बढ़ाते है किन्तु अभी परिर्थिति देखने पर यह ज्वलन्त समस्या सभी जाति में उत्पन्न हो रही है कि क्या पता काल का प्रभाव मानो या आयुकर्म को मानो अचानक मौते बुढ़े जवान की ज्यादा हो रही है। इसमें घर में मात्र दो प्राणी पति-पल्ली में से एक चल बसा। तो उस आदमी या औरत की क्या सिथिति होगी ? कोई 50 वर्ष कोई 60 वर्ष तथा कोई 30-35 वर्ष में मर रहे है। ऐसा भी हो रहा है। शादी के दो साल पांच साल में आदमी या औरत की अचानक मृत्यु पर अकेलापन त्था जिविकापार्जन के कोई साधन नही होने से विधवा या विधुर का शेष जीवन का निकलना बड़ा मुश्किल है। किसी व्यकि्ति की राजकीय सेवा पूर्ण होते ही वह अधिकारी कर्मचारी का देहान्त अचानक होने पर बिना पति या बिना पत्नी के क्या सहारा रहा। कभी-कभी अपनी संतान भी बुढे आदमी या बुढ़ी औरत की सेवा नही करते। उस समय उन विधुर या विधवा का जीवन कैसे निकले ।

जहं तक धर्म की बात है धर्म ध्यान करे लेकिन परिवार चलाना, आर्थिक संकट समाज में अपना स्वाभिमान यह सब देखने पर उनका जीवन कितना संकट में है वह स्वयं जानते है क्योंकि पति का वियोग या पलि का वियोग वर्तमान में सोचने हेतु मजबूर कर देता है।

मै यह भी कहता हॅ कि विधुर आर्थिक रूप से सक्षम हो तो समाज सेवा से संकट के बादल टल सकते है। यह निश्चित है कि “होनी को कौन टाल सकता है” स्वयं के आत्म निर्भरता के साथ परोपकार की भावना से अपने अकेलेपन को समाज की नईं गतिविधियों में भाग लेकर पत्लनि वियोग की चिन्ता नहीं चिंतन कर आत्म कल्याण करना हो अच्छा है उसी प्रकार विधवापना में सक्षम एवं स्वास्थ्य अच्छा हो तो महिलाओं को रचनात्मक कार्यों में हाथ बढाते हुए नारी शकि्ति नईं उमंग, नये उत्साह से समाज में शिक्षा की लॉ जगाने से अकेलापन महसूस नही होगा।

किन्तु विधवा विधूर आर्थिक शारीरिक मानसिक रूप से कमजोर हो तो भामाशाहों को उनकी देखभाल का बीड़ा उठाने से वह कभी अकेले इस बुनिया में है ऐसा आमास नहीं होगा ऐसा मेरा मानना है।

सभी से मेरा आग्रह है कि इस विषय पर अपनी राह देते हुए विधवा बहिनों एवं विधुर भाईयों को कभी पति वियोग या पल्ली वियोग महसुस न होने दे। यदि कभी दम्पति सुख के बाद किसी परिवार पर ऐसा संकट आवे तो उस संतान की परवरिश नैतिक जिम्मेदारी एवं
मानवधर्म मानते हुए उस संतान की ऑँकाक्षाऐं पूरी कर उसमे आत्म निर्मर बनाने से हमाराकर्तव्य जागृत करते हुए इस दुलर्म मानव जीवन मे “परस्परो जिवानाम” युक्त सार्थक कें तथा परम्पिता परमेश्वर से प्रार्थना करे हम कर कि पति वियोग या पल्लि वियोग पूर्ण आयु तक न देखना पड़े। इस संसार में जन्म हुआ मृत्यु निश्चित है परन्तु ऐसा वियोग न आवेतो अच्छा है। बचपन जवानी बुढ़ापा पूर्ण कर इस मनुष्य गति में अच्छे कार्य कर मोक्ष हम प्राप्त करें। यह हमारी सबकी भावना है क्योंकि उम्र के अन्ति पड़ाव में बुढ़े पति बुढी पलनी एक दूसरे
का सहारा होते है।

कविता:-विधुर-विधवा की पीडा

जब अकेला पति रहता क्यो बनाया जोड़ा,
पत्नि वियोग में घर सूना-सूना लगता ।

क्यों बनाया वर-वधु का जोड़ा जब अकेला,
ही रहना था तो दम्पति सुख मत देते विधाता।।

तनाव में ऐसे विचार आते,
यह संकट के बादल क्यों मुझे दिये विधाता।

सभी सुख से रहते है फिर,
अल्प आयु में यह वियोग मुझे क्यों दिया विधाता।।

मेरे सामने संतान दुखी,
अकेले में कैसे निकलेगे दिन, यह पति अकेला सोचता ।

बिना पत्नी के वियोग में,
पति दुनिया में अकेला अपने आपको मानता । I

बंधुओ यही है पाप और पुण्य,
कर्मो का लेखा रखता विधाता ।

इसलिए तो कहते है संत हमारे,
दुर्लभ मानव जीवन में धर्म ही उद्वार करता।|

पति वियोग में पत्नि का,
दुख भारी सबको लगता।

क्योंकि बिना सहारा क्या आधार
संसार असार सा लगता।।

जिसका सम्बल था वहीं नही.,
पति वियोग में कैसे जीवन कटता ।

ऐसे उदाहरण देखो सरहद पर,
शादी के बाद सैनिक सरहद पर जाता ।।

देश की रक्षा में कभी-कभी,
अपने प्राणों की आहुति देता।

यह पति वियोग कितनी चिंता,
नई दुल्हन की मेंहदी का रंग कैसे सुखता।।

कभी-कभी परिवार में दम्पति,
सुख मिलने के पहले पति का वियोग सताता ल

उस पत्नि पर क्या बीती,
आप बीती कौन सुनने जाता ।।

बड़ा गजब का विधि विधान,
कभी स्वर्ग का सुख तो कभी दुखों का पहाड़ गिरता ।

उत्सव जैन’ कहता प्यारे,
इस वियोग में हमारा सहयोग उनका दुख कम करता ल

लेखक
उत्सव जैन ‘कवि’
मु.पो. नौगामा तह. बागीदौरा बांसवाड़ा (राज.)

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