शहर की बेटियां बन रही आलिमा, मुस्लिम महिलाओं की समस्या होगी आसानी से हल

जलसे की फाइल फोटो

मुस्लिम महिलाओं की ऐसी बहुत सारी मजहबी समस्याएं होती है जो वह पुरुष मुस्लिम धर्मगुरुओं को बताने में संकोच करती है, लेकिन अब मुस्लिम महिलाओं की तमाम मजहबी समस्याओं का हल मिलना शुरु हो चुका है। शहर की लड़कियों का रुझान मजहबी शिक्षा की तरफ तेजी बढ़ा है

गोरखपुर। जलसा नं0 1 – नार्मल स्थित दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद पर 21 मई 2017 को मुस्लिम महिलाओं के सम्मेलन में मुस्लिम महिला धर्मगुरुओं (आलिमा) ने हजारों महिलाओं को संबोधित किया था। मंच से बोलने वाली ज्यादातर कम उम्र की शहर की आलिमा थी।

जलसा नं0 2 – खादिम हुसैन मस्जिद तिवारीपुर के निकट मैदान में 6 दिसम्बर 2017 को मुस्लिम महिला सम्मेलन में महिलाओं की रहनुमाई करने वाली ज्यादातर कम उम्र की आलिमा थी।

मुस्लिम महिलाओं की ऐसी बहुत सारी मजहबी समस्याएं होती है जो वह पुरुष मुस्लिम धर्मगुरुओं को बताने में संकोच व शर्म महसूस करती है और कतराती है। वहीं पुरुष मुस्लिम धर्मगुरु मुस्लिम महिलाओं की समस्याओं को जलसे के स्टेज पर कहने में संकोच करते है। ऐसे में सवाल पैदा होता है कि मुस्लिम महिलाओं की मजहबी समस्याओं का समाधान कैसे हो। मुस्लिम महिलाएं किसके सामने खुलकर अपनी बात रख सके। लेकिन अब मुस्लिम महिलाओं की तमाम मजहबी समस्याओं का हल मिलना शुरु हो चुका है। शहर की लड़कियों का रुझान मजहबी शिक्षा की तरफ तेजी बढ़ा है। शहर में अब मुस्लिम महिला धर्मगुरुओं (आलिमा) की तादाद बढ़ रही है। मुस्लिम महिलाएं मुस्लिम महिला धर्मगुरुओं के पास आसानी से अपनी समस्या कह ले रही है और समाधान भी पा रही है। शहर के मुस्लिम समाज में एक नए तरह का परिवर्तन देखने को मिल रहा है। जो एक बेहतर कल की ओर इशारा कर रहा है और यह भी संदेश दे रहा है कि मुस्लिम बेटियां मजहबी फिल्ड में भी बेटों से कम नहीं है। अभी आपने मुस्लिम समाज की बेटियों को डॉक्टर, इंजीनियर, वकील बनते सुना होगा लेकिन शहर की मुस्लिम बेटियों को आलिमा (मौलाना की डिग्री), मुफ्तिया (फतवा देने के लिए अधिकृत डिग्री), हाफिजा (पूरा कुरआन कंठस्थ करने पर मिलने वाली डिग्री) व कारिया (कुरआन बेहतरीन आवाज से पढ़ने में महारत हासिल होने पर मिलने वाली डिग्री) जैसी अहम मजहबी डिग्रीयां लेते हुए शायद ही सुना हो। मुस्लिम परिवारों में बहुत तेजी से परिवर्तन आ रहा है। मुस्लिम लड़कियों की रूचि उच्च मजहबी शिक्षा की तरफ बढ़ी है। शहर में 40 से अधिक मुस्लिम महिला धर्मगुरु (आलिमा) है। जो गोरखपुर की तमाम महिलाओं की रहनुमाई कर सकने में सक्षम है। बड़े -छोटे जलसों व मीलाद की महफिलों के जरिए मुस्लिम महिलाओं की रहनुमाई व जागरूकता भी ला रही है।

ज्यादातर है अच्छी वक्ता 

बुलाकीपुर के रहने वाले कारी मो. अनीस कादरी की एक बेटी आलिमा है और दूसरी बेटी आलिमा की पढ़ाई कर रही है। महज 18 साल की बड़ी बेटी ताबिंदा खानम आलिमा, कारिया होने के साथ बेहतरीन वक्ता है। ताबिंदा आलिमा का कोर्स करने के बाद घोसी मऊ से मुफ्तिया (फतवा देने के लिए अधिकृत कोर्स) की डिग्री लेना चाहती हैं। ताबिंदा को पढ़ाई पूरी करने में सात साल लगे, दो साल मुफ्तिया बनने में लगेंगे। बड़े-बड़े जलसों मे संबोधित करती है। इनकी छोटी बहन शोएबा अनीस भी आलिमा का कोर्स कर रही है। रसूलपुर की आलिमा शबाना खातून शम्सी जानी मानी इस्लामिक वक्ता है। इसी तरह रसूलपुर जामा मस्जिद के करीब रहने वाली मुफ्तिया गाजिया खानम (फतवा देने में सक्षम) मुस्लिम समाज की बड़ी आलिमा में शुमार होती है। वहीं रसूलपुर की ही समीना जबीं, पुराना गोरखपुर की नाजिश फातिमा, रसूलपुर दशहरी बाग की गुलफिशां अंजुम आलिमा बन महिलाओं की रहनुमाई कर रही है। इसके अलावा आलिमा रोजी खातून, कनीज फातिमा, शमीमा खातून, अहमदनगर की निकहत फातिमा, वसीम बानो, रसूलपुर की वसीमा खातून, काफिया नूर, गुलफिशां खातून, आलिमा व कारिया नूसरत जहां, मुबस्सिरा खातून, जरीन फातिमा, जेबा खातून, मुस्कान खातून, तशरीफुन्न निशा, तराना खातून, शहीदुन, समन फातिमा, शबनम बानो, शाहीना, सबा, नादिया खातून, तमन्ना खातून, सना खातून, उजमा खातून, खालिदा, राशिदा जहरा, शीबा खातून, रहमतुन निशा, तबस्सुम, निकहत बानो, चांदनी खातून, हबीबा खातून, रुखसार खातून, शहनाज बानो, तस्निया, आलिमा कारिया निशा फातिमा, आलिया खातून, जैनब खातून, साफिया खातून, खदीजा खातून अहमदनगर चक्शा हुसैन की तरन्नुम बानो, शमीमा खातून, कटसहरा की समीरा खातून आदि वह नुमाया नाम है जो मुस्लिम महिलाओं की मजहबी रहनुमाई कर रही हैं। शहर में इस वक्त शायद यह पहला मौका है जब इतनी बड़ी तादाद में मुस्लिम समाज की महिलाएं आलिमा, मुफ्तिया, हाफिजा व कारिया बन कर मुस्लिम समाज में जागरूकता लाने का कार्य कर रही है। शहर में मुस्लिम महिलाओं को आलिमा बनाने के लिए चंद मदरसे भी खुले है। आस-पास के जिलों में भी मदरसे खुल रहे हैं। मऊ के घोषी कस्बे का कुलयतुल बनातुल अमजदिया पूर्वांचल का मशहूर मदरसा है। इसके अलावा यहीं का जमयतुल बनात शमसुल उलूम भी महिलाओं की उच्च शिक्षा में मशहूर नाम है। जहां से हर साल सैकड़ों की तादाद में आलिमा, मुफ्तिया, हाफिजा व कारिया निकलती है।

“मुस्लिम समाज में तेजी से परिवर्तन आ रहा है। जब मैं किसी जलसे में जाती हूं दो तीन महिलाएं अपनी बच्चियों को लेकर आ जाती है और कहती है हमारी बच्चियों को भी आलिमा की पढ़ाई करवानी है रहनुमाई करें। इसके अलावा महिलाएं अपनी मजहबी दिक्कतें हमारे सामने आसानी से बयां कर देती है। अब माहौल बदल रहा है। इस क्षेत्र में मुस्लिम महिलाओं को आना चाहिए। ताकि एक बेहतरीन समाज कायम करने में मदद मिलें। जलसे व मीलाद की महफिलों द्वारा मुस्लिम महिलाओं को जागरूक किया जा रहा है। तालीम से ही परिवर्तन संभव है।
मुफ्तिया गाजिया खानम
रसूलपुर जामा मस्जिद के पास”

“मैंने बचपन में ही अब्बू से कह दिया था कि मुझे आलिमा बन कर मुस्लिम महिलाओं को जागरूक कर उनकी रहनुमाई करनी है। अब्बू ने भी मेरा साथ दिया। सात साल लगे मुझे आलिमा बनने में। लेकिन आज मैं महज 18 साल की उम्र में न केवल हजारों महिलाओं के बीच स्टेज पर तकरीर कर लेती हूं बल्कि दीन के मसले मसायल आसानी से बता भी लेती हूं। काफी महिलाएं मुझसे मसले मसायल पूछती रहती है। इसके अलावा जलसों के जरिए समाज में फैली तमाम बुराईयों पर खुलकर बोलने की कोशिश करती हूं और समस्या का समाधान भी बताती हूं। मुसलमान चाहे पुरुष हो या महिला दोनों के लिए तालीम हासिल करना बेहद जरुरी है। मुस्लिम लड़कियों को इस तरफ खास तवज्जो देनी की जरूरत है।
आलिमा ताबिंदा खानम
बुलाकीपुर”

“पहले मुस्लिम महिला धर्मगुरु मिलना (आलिमा) बहुत मुश्किल था लेकिन वक्त के साथ मुस्लिम समाज में बड़ा परिवर्तन हो रहा है। लड़कियों का रुझान उच्च मजहबी शिक्षा के प्रति बढ़ा है। इस वजह से मुस्लिम महिलाओं की तमाम समस्याओं के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा। अब मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में आलिमा आसानी से मिल जा रही है। मुस्लिम महिलाओं की रहनुमाई के लिए जलसे व मीलाद की महफिले बहुत कारगर है। इसके अलावा महिलाएं आलिमाओं के घर आकर भी समस्या का हल पा रही है। शहर में मुस्लिम महिलाओं के लिए एक ऐसे सेंटर की दरकार है। जहां आलिमा आसानी से मिल सके और महिलाओं की समस्या आसानी से हल हो सके। मैं तो जलसे, मीलाद के महफिलो व व्यक्तिगत रुप से महिलाओं में जागरूकता लाने के पूरी कोशिश करती हूं। मुस्लिम महिलाओं को इल्म की तरफ ज्यादा फोकस करना चाहिए। तभी महिलाओं की स्थिति बेहतर हो सकती है।

आलिमा शबाना खातून शम्सी
रसूलपुर”