सीएम के शहर में छह जगहों से दिया जाता है “फतवा”

“फतवा” मुसलमानों में कद्र की निगाह से देखा जाता है, मुसलमान मजहबी मामलात में इन “फतवों” पर अमल भी करते हैं।

गोरखपुर। ‘फतवों’ को लेकर समय-समय पर पूरे देश में बहस छिड़ी रहती है। हर बार दरगाह आला हजरत बरेली व दारुल उलूम देवबंद सहारनपुर से निकलने वाले फतवों से सियासी गर्माहट तेज हो जाती है। वहीं बहुत कम लोगों को पता है कि सीएम के शहर में एक नहीं छह जगहों से ‘फतवा’ दिया जाता है। मदरसा अंजुमन इस्लामियां खूनीपुर में कायम दारुल इफ्ता से मुफ्ती वलीउल्लाह, मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार से मुफ्ती अख्तर हुसैन अजहर मन्नानी, जामिया रजविया मेराजुल उलूम चिलमापुर से मुफ्ती खुर्शीद अहमद मिस्बाही अमजदी, शम्सी दारुल इफ्ता तुर्कमानपुर से मुफ्ती मोहम्मद अजहर शम्सी, दारुल इफ्ता जामा मस्जिद उर्दू बाजार से मुफ्ती अब्दुल्लाह गाजीपुरी मजाहिरी, दारुल इफ्ता वल इरशाद वजीराबाद कालोनी गोरखनाथ से मुफ्ती मो. मतीउर्रहमान कासमी फतवा देते है। ‘फतवा’ पूछने के लिए कोई शुल्क नहीं लगता है। मदरसा अंजुमन इस्लामियां खूनीपुर में कायम ‘दारुल इफ्ता’ सबसे पुराना है। उक्त तमाम जगहों से निकलने वाला ‘फतवा’ मुसलमानों में कद्र की निगाह से देखा जाता है। मुसलमान मजहबी मामलात में इन ‘फतवों’ पर अमल भी करते हैं। मजहबी मामलात के अलावा निकाह, तलाक, संपत्ति से जुड़े मामले में ‘फतवा’ अधिक पूछा जाता है। शहर में केवल एक महिला मुफ्तिया रसूलपुर की रहने वाली गाजिया खानम है। इनके पास महिलाएं काफी तादाद में मसला पूछने आती हैं। यह मीलाद की महफिलों के जरिए भी मुस्लिम महिलाओं की रहनुमाई करती हैं।

इन किताबों की सहायता से दिया जाता है ‘फतवा’

मुफ्ती मो. अजहर शम्सी ने बताया कि फिक्ह हनफी में फतावा आलमगीरी, फतावा काजी खां, फतावा शामी, दुर्रे मुख्तार, फतहुल कदीर, फतावा बजाजिया, हिदाया, बेदाया नेहाया, बदा-ए-उशसनाए, अल बहरुर्रायक, अल जौहरतुन नय्यरा, फतावा रजविया शरीफ, बहारे शरीयत, फतावा अमजदिया, आदि की सहायता से फतवा दिया जाता है। यह किताबें अरबी में होती हैं। कुछ किताबें उर्दू में भी होती हैं। उक्त फतवों की किताबों से हनफी मजहब के मसले हल किए जाते हैं।

इन मसलों में दिया जाता है ‘फतवा’

शम्सी दारुल इफ्ता तुर्कमानपुर में वर्ष 2015 से दर्जनों लिखित व एक हजार से ज्यादा मौखिक ‘फतवा’ दे चुके मुफ्ती मो. अजहर शम्सी ने मजहबी मामलात, मोबाइल, निकाह, संपत्ति बटवांरा आदि पर ‘फतवा’ दिया है। उन्होंने विभिन्न मसलों पर एक दर्जन किताबें लिखीं व एक लाइब्रेरी भी कायम की। उन्होंने बताया कि बताया कि ‘फतवा’ देने का हुक्म कुरआन व हदीस से साबित है। मुसलमानों के मजहबी मामलात (नमाज, रोजा, हज, जकात आदि) व पर्सनल लॉ (निकाह, मेहर, तलाक, भरण पोषण, विरासत, सम्पत्ति बटवांरा, उत्तराधिकार, वसीयत, वक्फ आदि) के मामलात में ‘फतवा’ दिया जाता है। ‘फतवा’ केवल मुफ्ती (पीएचडी के समकक्ष) ही दे सकता है। मुफ्ती की पढ़ाई दो साल की होती है। मुफ्ती की पढ़ाई बड़े मदरसों में ही होती है। मुफ्ती की पढ़ाई के लिए फाजिल होना जरुरी है।

फतवा’ का अर्थ शरीयत का हुक्म बताना

जामिया रजविया मेराजुल उलूम चिलमापुर में कायम दारुल इफ्ता में मुफ्ती खुर्शीद अहमद मिस्बाही अमजदी काफी समय से फतवा दे रहे हैं। फतवा देते हुए इन्हें 20 साल हो चुका है। हर विषय पर 500 के करीब फतवा दे चुके हैं। पिछले साल सुन्नी बरेलवी मुसलमानों ने इन्हें अपना काजी-ए-गोरखपुर चुना था। दो किताबें भी लिख चुके हैं। वह बताते हैं कि ‘फतवा’ अरबी शब्द है इसका अर्थ होता है शरीयत का हुक्म बताना। ‘फतवा’ दो प्रकार का होता है। पहला ‘फतवा तकरीरी’ यानी कोई शख्स मुहं जबानी मुफ्ती से किसी मसले में शरीयत के हुक्म को पता करता है। दूसरा ‘फतवा तहरारी’ होता है यानी लिखित। ‘फतवा तहरीरी’ लेने के लिए एक कागज पर सवाल लिखकर दारुल इफ्ता में मुफ्ती के सामने पेश किया जाता है। मुफ्ती सवाल का जवाब कुरआन व हदीस की रोशनी में उसी सवाल वाले कागज पर लिखकर दे देता है। जवाब के अंत में दारुल इफ्ता की मोहर व मुफ्ती की दस्तखत होती है। मुफ्ती दिए गए फतवे की एक कापी अपने पास जरुर रखता है। ‘फतवा’ नि:शुल्क दिया जाता है।

फतवा’ जबरदस्ती नहीं मनवाया जा सकता

मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार में दारुल इफ्ता की जिम्मेदारी मुफ्ती अख्तर हुसैन अजहर मन्नानी की है। वह वर्ष 2005 से अब तक हर विषय पर करीब 500 ‘फतवा’ दे चुके हैं। इन्हें सुन्नी बरेलवी मुसलमानों ने पिछले साल मुफ्ती-ए-गोरखपुर चुना था। उन्होंने बताया कि ‘फतवा’ शरीयत (कुरआन व हदीस में दिया गया कानून) का हुक्म होता है जो सवाल करने वाले को बता दिया जाता है। एक प्रकार की सलाह है कि शरीयत में ऐसा करना उचित है या अनुचित। मानना या न मानना सवाल करने वाले के विवेक पर है। लोकतांत्रिक देश में ‘फतवा’ जबरदस्ती मनवाया नहीं जा सकता है। ‘फतवा’ कुरआन व हदीस की रोशनी में किए गए सवाल का जवाब व रहनुमाई है। फतवा मांगने का कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। ‘फतवा’ बेहतरीन समाज के निर्माण का एक महत्वपूर्ण साधन है। यह व्यवस्था सदियों से चली आ रही है। मुफ्ती अपनी तरफ से कुछ नहीं कह सकता है बल्कि कुरआन व हदीस में जो लिखा है वह उसको ही बयान कर देता है।

शहर के मुफ्ती

मुफ्ती अख्तर हुसैन अजहर मन्नानी, मुफ्ती मोहम्मद अजहर शम्सी, मुफ्ती खर्शीद अहमद मिस्बाही अमजदी, मुफ्तिया गाजिया खानम, मुफ्ती वलीउल्लाह, मुफ्ती अब्दुल्लाह गाजीपुरी मजाहिरी, मुफ्ती मो. मतीउर्रहमान कासमी, मुफ्ती मेराज, मुफ्ती उजैर, मुफ्ती मुनीर कासमी, मुफ्ती सादुल्लाह, मुफ्ती शुएब, मुफ्ती नूर मोहम्मद तनवीरी, मुफ्ती हुजैफा आदि।

फतवा’ से होती है आवाम की रहनुमाई

दारुल इफ्ता जामा मस्जिद उर्दू बाजार में मुफ्ती अब्दुल्लाह गाजीपुरी मजाहिरी वर्ष 2014 से फतवा दे रहे हैं। हर विषय पर करीब 100 से ज्यादा ‘फतवा’ दे चुके हैं। वह बताते हैं कि ‘फतवों’ के बारे में एक गलतफहमी फैली हुई है कि ‘फतवा’ मुफ्ती अपने तरफ से देते है हालांकि ऐसा बिल्कुल नहीं है बल्कि मुफ्ती कुरआन व हदीस के रोशनी में पूछे गए सवाल का जवाब देते हैं। उलेमा ‘फतवा’ किसी पर थोपते नहीं है। ‘फतवा’ किसी व्यक्ति का नाम लेकर भी जारी नहीं किया जाता। ‘फतवा’ जितना मुस्लिम आवाम पर लागू होता है उतना ही उलेमा पर भी लागू होता है। ‘फतवों’ से आवाम की रहनुमाई की जाती है। मुफ्ती शरीयत का कानून बनाता नहीं है बल्कि बताता है।