दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-islam) अखलाक से फ़ैला, तलवार से नहीं : शेर मोहम्मद

घोसीपुरवा में हुआ जलसा-ए-आला हज़रत

गोरखपुर। दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-islam) के बानी पैगंबर-ए-आज़म हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इंसानों को आला अखलाक की तालीम दी। इंसान को सच्चाई का रास्ता दिखाया और सभी को बराबरी का हक दिया। जो भी दीन-ए-इस्लाम का जितना अध्ययन करता है उसका यकीन पुख्ता हो जाता है कि दीन-ए-इस्लाम तलवार से नहीं बल्कि अखलाक से फैला है।

यह बातें बतौर मुख्य वक्ता महराजगंज के मौलाना शेर मोहम्मद ने मदरसा दारुल उलूम अहले सुन्नत मजहरुल उलूम घोसीपुरवा में शनिवार को आयोजित जलसा-ए-आला हज़रत में कही।

उन्होंने कहा कि आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खां अलैहिर्रहमां ने दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-islam) शरीयत और पैगंबर-ए-आज़म हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की सुन्नतों की सही तफसीर पेश की। जिससे पूरी दुनिया में आला हज़रत को दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-islam) के सच्चे आलिम-ए-दीन के तौर पर जाना गया। मसलके आला हज़रत जन्नत तक ले जाने वाले रास्ते की निशानी है।

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आला हज़रत ने बदअकीदगी व गुमराही के तूफान को रोका। करोड़ों मुसलामानों का ईमान बचाया। आला हज़रत को पैगंबर-ए-आज़म से गहरा इश्क था। आला हज़रत ने पूरी जिंदगी दीन-ए-इस्लाम के लिए वक्फ कर दी, इसीलिए आज पूरी दुनिया के मुसलमान उर्स-ए-आला हज़रत मना रहे हैं।

विशिष्ट वक्ता कारी मो. तनवीर अहमद कादरी ने कहा कि आला हज़रत की जिंदगी का हर गोसा कुरआन और सुन्नत पर अमल करने व सुन्नियत को जिंदा करने में गुजरा। मुजद्दीदे दीन-ओ-मिल्लत आला हज़रत ने फि़त्ना और फसाद के जमाने में मुसलमानों को अपना ईमान बचाने में मदद की। आला हजरत सुन्नियत के सबसे बड़े अलमबरदार हैं। जिस जमाने में दुश्मनाने रसूल सर उठा रहे थे, आपने उनका सर कूचला अपने तहरीरों, तकरीरों, तसनीफों से। मुसलमानों की सच्ची रहनुमाई फरमायी।

आला हज़रत चौदहवीं सदी हिजरी के मुजद्दिद हैं। आला हजरत ने कुरआन-ए-पाक का उर्दू में लाजवाब तर्जुमा ‘कंजुल ईमान’ किया। जिसे पढ़ने से ईमान ताजा हो जाता है। उन्होंने कहा कि उर्दू हमारी तहजीब का हिस्सा है। यह हिन्दुस्तान की आन, बान और शान है। उर्दू को बचाने के लिए हमें आगे आना होगा। इसकी शुरुआत हमें अपने घर से करनी होगी।

उर्दू को बचाने की गई अपील 

विशिष्ट वक्ता मौलाना हारुन मिस्बाही ने कहा कि दिल को अल्लाह के जिक्र से खाली नहीं रखना चाहिए। हम मुसलमान हैं। हमारा दीन इस्लाम है (Deen-e-islam), यह हमारे लिए बड़े गर्व की बात है। दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-islam) ने लोगों को मोहब्बत का पैगाम दिया है। दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-islam) जोड़ता है, सबका भला चाहता है। मुसलमान अमन का पैरोकार है वो दुनिया में शांति चाहता है।

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मदरसा मजहरुल उलूम घोसीपुरवा में जलसा-ए-आला हजरत।

जलसे का आगाज कारी अब्दुर्रहमान निज़ामी ने कुरआन-ए-पाक की तिलावत से किया। इसके बाद मदरसे के छात्रों ने नात पेश की। संचालन हाफिज मौलाना वारिस मिस्बाही ने किया। कुरआन ख्वानी व फातिहा ख्वानी की गई। उलेमा-ए-किराम ने मदरसा प्रांगण में पौधारोपण किया। आखिर में सलातो सलाम पढ़कर हिन्दुस्तान व पूरी दुनिया में अमनो सलामती की दुआ मांगी गई। शीरीनी बांटी गई।

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मदरसा प्रागंण में उलेमा-ए-किराम ने किया पौधारोपण।

जलसे में कारी रईसुल कादरी, मौलाना अब्दुर्रब मिस्बाही, मौलाना मो. जाहिद मिस्बाही, हाफिज रुखसार, हाफिज हिदायत, हाफिज मो. अय्यूब, हाफिज नसीरुद्दीन, हाफिज अंसारुल हक, हाफिज हिदायतुल्लाह, हाफिज शाकिर, कासिम, सलाहुद्दीन अंसारी, जमील अहमद आदि ने शिरकत की।

आला हज़रत को किया याद

मदरसा जियाउल उलूम पुराना गोरखपुर में शनिवार को उर्स-ए-आला हजरत मनाया गया। बाद नमाज फज्र कुरआन ख्वानी हुई। बाद नमाज जोहर आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खां अलैहिर्रहमां की शख्सियत पर तकरीरी प्रोग्राम हुआ। मदरसे के प्रधानाचार्य मौलाना नूरुज्जमा मिस्बाही व मौलाना जमील अख्तर मिस्बाही ने आला हज़रत की जिंदगी पर रोशनी डाली।

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हाफिज मो. अतहर हुसैन की तिलावते कुरआन से प्रोग्राम का आगाज़ हुआ। हाफिज शाहनवाज व हाफिज वासिफ रज़ा ने नात पेश की। आखिर में सलातो सलाम के बाद मौलाना मो. निजामुद्दीन ने दुआ मांगी। शीरीनी बांटी गई।

तुर्कमानपुर में हुई आला हज़रत कांफ्रेंस

आला हज़रत इमाम अहमद रजा खां अलैहिर्रहमां की याद में नूरी मस्जिद तुर्कमानपुर के पास शनिवार को ‘आला हज़रत कांफ्रेंस’ हुई। मुख्य अतिथि अगया शरीफ से आये पीरे तरीकत अल्लामा हबीबुर्रहमान ने कहा कि आला हज़रत ने दीन-ए-इस्लाम को कंजुल ईमान (कुरआन-ए-पाक का उर्दू तर्जुमा) के रूप में एक अहम तोहफा अता किया। आला हज़रत द्वारा लिखे कंजुल ईमान तर्जुमे से हमें पता चलता है कि यही अकेला ऐसा तर्जुमा (अनुवाद) है जो गलतियों से पाक है।

कुरआन-ए-पाक का उर्दू तर्जुमा कंजुल ईमान ही पढ़ें और ईमान की हिफाजत करें। कंजुल ईमान में वह सारी खूबियां मिलती हैं जो अल्लाह और उसके रसूल की शान बढ़ाने के लिए होनी चाहिए। कंजुल ईमान का तर्जुमा बहुत सी जुबानों में पूरे विश्व में हो चुका है। कुरआन-ए-पाक का तर्जुमा करना सबके बस की बात नहीं। कुरआन की असल मंशा को समझने के साथ आयते कुरआनी के अंदाज को पहचानना उस आलिम-ए-दीन का काम (Deen-e-islam) है जिसकी दीनी निगाह बहुत तेज हो। आला हज़रत तमाम खूबियों के मालिक थे।

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उन्होंने कहा कि दौलत से दिल में अंधेरा होता है और इल्म से दिल को रोशनी मिलती है। जैसा कि फरमाया गया है कि अगर इल्म के लिए तुम्हें चीन भी जाना पड़े और दूर जाना पड़े तो हर हालत में इल्म हासिल करो। इल्म से दूरी या इल्म वालों से बुग्ज और पढ़ने लिखने से दूरी इंसान को हलाकत तक पहुंचा देती है। इस्लामी तहजीब में वही सच्चा मुसलमान है जो कुरआन-ए-पाक सीखें और सिखाए जिससे अल्लाह की मारफत हासिल हो।

कंजुल ईमान’ है कुरआन-ए-पाक का सबसे उम्दा तर्जुमा : हबीबुर्रहमान

महराजगंज से आये विशिष्ट अतिथि मौलाना खुर्शीदुल इस्लाम ने कहा कि रसूल-ए-पाक हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने मस्जिद-ए-नबवी की तामीर की तो उसके साथ तालीम के लिए चबूतरा तामीर फरमाया। जिस पर बैठकर सहाबा इल्म-ए-दीन सीखते थे और जिंदगी गुजारने के लिए आपसे तहजीब और तमद्दुन की बात मालूम करते थे।

हालांकि मस्जिद-ए-नबवी की तामीर का दौर आप और आपके सहाबा पर आर्थिक तंगी का जमाना था, पेट पर पत्थर बांधे हुए होते थे फिर भी उस वक्त मस्जिद और चबूतरा बनाते अल्लाह के रसूल ने मुसलमानों को यह तालीम दे दी है कि मुसलमान भूखा प्यासा रह सकता है मगर जैसे नमाज से दूर नहीं हो सकता उसी तरह इल्म हासिल करने से भी दूर नहीं रह सकता, जैसे नमाज फर्ज है उसी तरह इल्म हासिल करना भी फर्ज है।

नूरी मस्जिद तुर्कमानपुर के इमाम मौलाना मो. असलम रज़वी ने कहा कि हर मुरीद को अपने पीर पर नाज़ होता है, लेकिन आला हज़रत ऐसे मुरीद हैं कि उन पर उनके पीर को नाज़ है। आला हज़रत फरमाते हैं कि अल्लाह और रसूल-ए-पाक हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के महबूबों से मोहब्बत और अल्लाह और रसूल-ए-पाक के दुश्मनों से दुश्मनी ईमान की पहचान है।

नात शरीफ कारी सनाउर्रहमान ने पेश की। संचालन मौलाना मकसूद आलम मिस्बाही ने किया। अंत में सलातो सलाम पढ़कर मुल्क में अमनो सलामती व तरक्की की दुआ मांगी गई। शीरीनी बांटी गई।

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इस दौरान शाबान अहमद, अलाउद्दीन निज़ामी, अशरफ निज़ामी, नदीम अहमद, नूर आलम, आसिफ अहमद, इमरान अली निज़ामी, साबिर अली, कारी मोहसिन रज़ा, मौलाना मोहम्मद अहमद, मौलाना मकबूल अहमद खान, तौहीद अहमद, मनोव्वर अहमद, मो कलीम अशरफ, शुएब अहमद अंसारी, हाजी अब्दुल्लाह, शहबाज चिश्ती, उमर कादरी, हाजी सेराज अहमद, कारी शराफत हुसैन कादरी सहित सैकड़ों अकीदतमंद शामिल हुए।

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