गोपालदास नीरज के पार्थिव शरीर को राजकीय सम्मान के साथ शव-यात्रा निकालकर किया गया अंतिम संस्कार

नुमाइश ग्राउंड के मुक्ताकाश शमशान घाट में नीरज जी के पुत्र ने दी अंतिम विदाई के साथ मुखाग्नि

अलीगढ़। अलीगढ़ में महाकवि पद्मश्री गोपालदास नीरज जी के पार्थिव शरीर को राजकीय सम्मान के साथ शव यात्रा निकालकर किया गया अंतिम संस्कार, नुमाइश ग्राउंड के मुक्ताकाश शमशान घाट में नीरज जी के पुत्र ने दी अंतिम विदाई के साथ मुखाग्नि, उत्तर प्रदेश के दुग्ध विकास कैबिनेट मंत्री चौ० लक्ष्मीनारायण के अलावा देश के कौने-2 सेआये कवि और नेताओं का लगा रहा जमावड़ा, जिला प्रशासन ने हर जगह पूर्ण रखी व्यवस्था।

हिन्दी कविता और कवि सम्मेलनों में जान फूंकने वाले इटावा जिले के गाँव पुरवली में 4 जनवरी 1925 में जन्मे गोपाल दास नीरज का 19 जुलाई 2018 को दिल्ली के एम्स में ह्रदय गति रुकने देहांत हो गया, जिनका आज पार्थिव शरीर दिल्ली से आगरा जिसके बाद अलीगढ़ के मेरिस मैरिस रोड स्थित जनकपुरी में बने उनके आवास आवास पर लाया गया, जहाँ नीरज जी के पार्थिव शरीर को राजकीय सम्मान के दिया गया, उसके बाद शव यात्रा शहर के सेंटर पॉइंट स्टेट बैंक चौराहा होते हुए कृष्णांजलि नाट्यशाला पहुंची, नाट्यशाला में तमाम लोगों ने उनके अंतिम दर्शन किए, और प्रदेश के कैबिनेट दुग्ध विकास मंत्री लक्ष्मीनारायण समेत नेतागण और जिले के सभी अधिकारीयों ने उनको पुष्प अर्पण किये, तो वही नीरज को अंतिम सलामी दी गई, जहाँ से उनके पार्थिव शरीर को उनके परिवारीजन और चाहने वालों ने नुमाइश ग्राउंड स्थित मुक्ताकाश श्यमशान में गृह में उनके पुत्र गुंजन नीरज मुखाग्नि दी, इस मौके पर हर किसी की ऑंखें नम थीं। मंत्री चौ० लक्ष्मीनारायण द्वारा कहा गया कि वह शाजहांपुर के प्रभारी मंत्री हैं, वहाँ प्रधानमंत्री आये हुए हैं, उसके बाद भी में यहाँ मुख्यमंत्री के आदेशों का पालन करते आया हूँ, उन्होंने कहा था कि नीरज जी देश के गौरव है, वहीँ आगे कहा कि यह बहुत ही दुःख की घडी है कि हमने देश के एक बहुत बड़े कवि को खो दिया है, जिनकी अब यादें हमारे बीच रह गईं हैं।

वहीँ आपको बतादें कि जब से नीरज प्राण त्यागे थे, तभी से एक बहश नीरज जी के दोनों पुत्र गुंजन नीरज और प्रभात नीरज के बीच छिड़ गई, वह ये कि उनके द्वारा जेएन मेडिकल को अपनी देहदान की गई थी, देहदान की जाये कि नहीं, हालाँकि परिवार के मुख्य सदस्यों द्वारा निर्णय लेते हुए जिलाधिकारी को एक पत्र लिखकर देहदान से इंकार करते हुए शव यात्रा निकालकर अंतिम संस्कार कर दिया गया।