इमाम हुसैन कल भी जिंदा थे, आज भी जिंदा हैं : मौलाना मकसूद

एक दर्जन से अधिक जगहों पर जारी ‘जिक्रे शोह-दाए-कर्बला’ की महफिल 

गोरखपुर । शनिवार ‘जिक्रे शोह-दाए-कर्बला’ की महफिलों के नाम रहा। उलेमा ने दीन-ए-इस्लाम, शहादत और कर्बला के बाबत विस्तार से बयान किया। सातवीं मुहर्रम को करीब एक दर्जन से अधिक मस्जिदों में ‘जिक्रे शोहदा-ए-कर्बला’ की महफिलों का दौर जारी रहा। मुहर्रम की सातवीं तारीख को जालिम यजीदियों ने हजरत इमाम हुसैन व उनके साथियों के लिए पानी पर रोक लगा दी थी। कर्बला का वाकया सुनकर अकीदतमंद याद-ए-हुसैन के अश्कों में डूब गए।

गौसिया मस्जिद छोटे काजीपुर में मौलाना मोहम्मद अहमद ने कहा कि कर्बला के बहत्तर शहीदों ने जो बेमिसाल काम किया, उसकी मिसाल दुनिया में नहीं मिलती है। 9 मुहर्रम सन् 61 हिजरी शाम के वक्त इब्ने-साद ने अपने साथियों को हजरत इमाम हुसैन के काफिले पर हमला करने का हुक्म दिया। आशूरा मुहर्रम की रात खत्म हुई और दसवीं मुहर्रम सन् 61 हिजरी मुताबिक 28 अक्टूबर सन् 681 ई. की कयामत नुमा सुबह नमूदार हुई। इमाम हुसैन के अहले बैत व जांनिसार एक-एक कर शहीद हो गए और दीन-ए-इस्लाम का परचम बुलंद कर गए। हजरत इमाम जैनुल आबिदीन, हजरत उमर बिन हसन, मोहम्मद बिन उमर बिन अली और दूसरे कम उम्र साहबजादे कैदी बनाए गए। हजरत सकीना, हजरत जैनब हजरत इमाम हुसैन की सगी बहन व पत्नी शहरबानो व दूसरे अहले बैत हजरात की बीवियां भी कैदी बनायी गईं। इन पर बहुत जुल्म किया गया लेकिन सभी ने सब्र का दामन थामें रखा।

दरगाह हजरत मिस्कीन शाह अंधियारीबाग में मौलाना मो. कैसर रज़ा अमजदी ने बताया कि इमाम हुसैन के साथ मक्का शरीफ से इराक की जानिब सफर करने वालों में आपके तीन पुत्र 22 वर्षीय हजरत अली औसत (इमाम जैनुल आबेदीन), 18 वर्षीय हजरत अली अकबर, 6 माह के हजरत अली असगर शामिल थे। इमाम हुसैन के काफिले में कुल 91 लोग थे। जिसमें 19 अहले बैते किराम (पैगंबर-ए-इस्लाम के घराने वाले) और अन्य 72 जांनिसार थे। इमाम हुसैन की सात वर्षीय बहन हजरत सकीना भी साथ में थीं। इमाम हुसैन की दो बीवियां शहरबानो व रुबाब बिन्त इमरउल-कैस भी साथ थीं।

दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद मस्जिद नार्मल में मौलाना मकसूद आलम मिस्बाही ने कहा कि कर्बला के मैदान में हजरत फातिमा ज़हरा के दुलारे हजरत सैयदना इमाम हुसैन जैसे ही फर्श-ए-जमीन पर आये कायनात का सीना दहल गया। काबा की दीवार हिल गयी। सूरज ने सर्मा के मुहं ढ़ाप लिया। इमामे हुसैन को कर्बला के तपते हुए रेगिस्तान पर दीन-ए-इस्लाम की हिफाजत के लिए तीन दिन व रात भूखा प्यासा रहना पड़ा। अपने भतीजे हजरत कासिम की लाश उठानी पड़ी। हजरत जैनब के लाल का गम बर्दाश्त करना पड़ा। छः माह के नन्हें हजरत अली असगर की सूखी जुबान देखनी पड़ी। हजरत अली अकबर की जवानी को खाक व खून में देखना पड़ा। हजरत अब्बास अलमबदार के कटे बाजू देखने पड़े, फिर भी हजरत इमाम हुसैन ने दीन-ए-इस्लाम को बुलंद करने के लिए सब्र का दाम नहीं छोड़ा। इमाम हुसैन कल भी जिंदा थे, आज भी जिंदा हैं और सुबह कयामत तक जिंदा रहेंगे।

नूरी मस्जिद तुर्कमानपुर में मौलाना मो. असलम रज़वी ने कहा कि पैगंबर-ए-आज़म हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि अपनी औलाद को तीन बातें सिखाओ। अपने पैगंबर की उल्फत व मुहब्बत। अहले बैत (पैगंबर के घराने वाले) की उल्फत व मुहब्बत। कुरआने करीम की किरत। जब तक मुसलमानें के हाथों में कुरआन और अहले बैत का दामन रहा वह कभी गुमराह और रुसवा नहीं हुए बल्कि हमेशा फतह उनके कदम चूमती रही लेकिन जैसे ही मुसलमानों ने उन दोनों के दामन से दूरी बनायी हर जगह जिल्लत व रुसवाई उनके सामने आती चली गयी। लिहाजा आज भी अगर हम कुरआन व अहले बैत से ताल्लुक जोड़ ले तो कामयाबी हमारे कदम चूमेगी।

बेलाल मस्जिद इमामबाड़ा अलहदादपुर में कारी शराफत हुसैन कादरी ने कहा कि पैगंबर-ए-आज़म हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जिसने मेरे अहले बैत से बुग्ज (जलन) रखा अल्लाह उसको दोजख में डालेगा। एक जगह इरशाद फरमाया जो लोग हौज-ए-कौसर पर पहले आएंगे वह मेरे अहले बैत होंगे। पैगंबर-ए-आज़म ने इरशाद फरमाया कि अगर तुम हिदायत चाहते हो और गुमराही और जलालत से अपने आपको दूर रखना चाहते हो तो अहले बैत का दामन थाम लो।

बहादुरिया जामा मस्जिद रहमतनगर में नमाज के दौरान शोहदा-ए-कर्बला पर बयान करते मौलाना अली अहमद।
बहादुरिया जामा मस्जिद रहमतनगर में नमाज के दौरान शोहदा-ए-कर्बला पर बयान करते मौलाना अली अहमद।

इसी तरह मस्जिद जोहरा मौलवी चक बड़गो, एक मीनारा मस्जिद बेनीगंज, बहादुरिया जामा मस्जिद रहमतनगर, मस्जिद हरमैन रायगंज, मुकीम शाह जामा मस्जिद बुलाकीपुर, सुप्पन खां की मस्जिद खूनीपुर, इमामबाड़ा पुराना गोरखपुर आदि में ‘जिक्रे शोह-दाए-कर्बला’ की महफिल हुई।

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