इस्लाम जिंदा होता है हर कर्बला के बाद

मस्जिदों में जारी ‘जिक्रे शोहदा-ए-कर्बला’ की महफिल

गोरखपुर । माह-ए-मुहर्रम शुरु हो चुका है। माहौल सोगवार है। महफिल व मजलिसों के जरिए हजरत सैयदना इमाम हुसैन रजियल्लाहु अन्हु व उनके 72 साथियों की कुर्बानी को याद किया जा रहा है। मस्जिदों में ‘जिक्रे-शोहदा-ए-कर्बला’ की महफिल में हजरत सैयदना इमाम हुसैन व उनके साथियों की फज़ीलत बयान की जा रही है। मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में चहल पहल है।

चिश्तिया मस्जिद बक्शीपुर में छह दिवसीय ‘जिक्रे शोहदा-ए-कर्बला’ महफिल के पहले दिन रविवार को मस्जिद के पेश इमाम हाफिज महमूद रज़ा कादरी ने कहा कि हजरत सैयदना इमाम हुसैन सन् चार हिज़री को मदीना में पैदा हुए। आपकी मां का नाम हजरत फातिमा ज़हरा व पिता का नाम हजरत अली है। जब पैगंबर-ए-आज़म हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने हजरत हुसैन के पैदा होने की खबर सुनी तो फौरन तशरीफ लाए। आपने दायें कान में अज़ान दी और बायें कान में इकामत पढ़कर इमाम हुसैन के मुहं में अपना लुआबे दहन डाला और दुआएं दी, फिर आपका नाम हुसैन रखा। सातवें दिन अकीका करके बच्चे के बालों के हमवजन चांदी खैरात करने का हुक्म दिया। आपके अकीके में दो मेढ़े जब्ह किए गए।

इमामबाड़ा पुराना गोरखपुर में दस दिवसीय महफिल के पहले दिन मौलाना मोहम्मद जहांगीर अहमद अजीजी ने कहा कि जब हजरत सैयदना इमाम हुसैन की उम्र सात साल की थी तब पैगंबर-ए-आज़म ने पर्दा (इंतकाल) फरमाया। जब अमीरुल मोमिनीन हजरत सैयदना उमर की खिलाफत शुरू हुई तो आप सवा दस बरस के थे। अहदे अमीरुल मोमिनीन हजरत सैयदना उस्मान में पूरे जवान हो चुके थे। सन् तीस हिज़री में तबरिस्तान के जेहाद में शरीक हुए। अपने पिता अमीरुल मोमिनीन हजरत सैयदना अली के अहद (शासन) में जंग-ए-जुमल व जंग-ए- सिफ़्फीन में शरीक हुए।

नूरी मस्जिद तुर्कमानपुर में दस दिवसीय महफिल के पहले दिन मौलाना मो. असलम रज़वी ने कहा कि हजरत सैयदना इमाम हुसैन की कुर्बानी ने दीन-ए-इस्लाम को जिंदा कर दिया, इसीलिए मौलाना मोहम्मद अली जौहर कहते हैं ‘कत्ले हुसैन असल में मर्गे यजीद है, इस्लाम जिंदा होता है हर कर्बला के बाद’। हजरत इमाम हुसैन इबादत व रियाजत में बडे़ आबिद, जाहिद व तहज्जुद गुजार थे। आप निहायत हसीन व खूबसूरत थे। पूरा-पूरा दिन और सारी-सारी रात नमाजें पढ़ने और तिलावत-ए-कुरआन में गुजार दिया करते थे। इमाम हुसैन का जिक्र-ए-खुदावंदी का शौक कर्बला की तपती हुई जमीन पर तीन दिन के भूखे-प्यासे रह कर भी न छूटा। शहादत की हालत में भी दो रकात नमाज अदा करके बारगाहे खुदावंदी में अपना आखिरी नजराना पेश फरमा दिया।

इसी क्रम में अंधियारी बाग में दरगाह मिस्कीन शाह अलैहिर्रहमां, मस्जिद सुप्पन खां (कुरैशिया) खूनीपुर, मक्का मस्जिद मेवातीपुर इमामबाड़ा, बहादुरिया जामा मस्जिद रहमतनगर, हजरत मुकीम शाह जामा मस्जिद बुलाकीपुर, मस्जिद हरमैन रायगंज, गौसिया मस्जिद छोटे काजीपुर, एक मीनारा मस्जिद बेनीगंज, मियां बाजार इमामबाड़ा मर्सिया खाना, बेलाल मस्जिद इमामबाड़ा अलहदादपुर, हजरत मुबारक खां शहीद मस्जिद नार्मल, दारुल उलूम अहले सुन्नत मजहरुल उलूम घोसीपुरवा, कलशे वाली मस्जिद मिर्जापुर के निकट आदि में भी ‘जिक्रे-शोहदा-ए-कर्बला’ की महफिल हुई।

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