मदरसों ने शिक्षा के माध्यम से अमीर-गरीब का फर्क मिटाया : मोहम्मद अहमद

 

जलसा-ए-ईद मिलादुन्नबी

गोरखपुर । ईद मिलादुन्नबी के बाद जलसों का दौर जारी है। यह सिलसिला इसी तरह पूरे माह चलेगा। मंगलवार को नौजवान कमेटी की ओर से जटेपुर उत्तरी में जलसा-ए-ईद मिलादुन्नबी हुआ। मुख्य वक्ता मौलाना मोहम्मद अहमद निज़ामी व कारी अफ़जल बरकाती ने कहा कि पैगंबर-ए-आज़म हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम कायनात की जान हैं। उन पर उतरने वाली किताब कुरआन-ए-पाक की पहली आयत इल्म हासिल करने से ताल्लुक रखती है। इल्म की अहमियत की वजह से मुसलमानों को कयादत मिली। मुस्लिम वैज्ञानिकों ने कुरआन व हदीस में गौर फिक्र करके नई-नई खोजें की। मदरसों ने हिन्दुस्तान में सामाजिक क्रांति की।

मदरसों ने जिस तरह से शिक्षा के माध्यम से अमीर-गरीब का फर्क मिटाया वह दुनिया के किसी अन्य एजुकेशनल सिस्टम में खोजने से भी नहीं मिलता। मौलाना, मुफ्ती, हाफिज और मौलवी के नाम के बाद आज भी साहब लगाया जाता है। करोड़पति मुसलमान भी ऐसे आलिमों को सम्मान देते नहीं थकते। तमाम बुरे हालातों में भी मुसलमानों ने अपने शैक्षणिक संस्थानों को बचाए रखा। मदरसे सीना ताने खड़े रहे। आलिमों ने गांव-गांव टहल कर अभिभावकों से बच्चों को मांगा। उन्हें पढ़ाया ताकि वे इज्जत की ज़िंदगी बसर कर सकें। यतीमों को गोद लिया। बेसहारा को ज़िंदगी दी। यह पैगाम दिया कि इस्लामी शिक्षा पर सभी का बराबर हक़ है।

शाहिदाबाद हुमायूंपुर उत्तरी में जलसा-ए-ईद मिलादुन्नबी हुआ। जिसमें नायब काजी मुफ्ती मो. अज़हर शम्सी व कारी आबिद अली निज़ामी ने कहा कि अल्लाह की रस्सी को मजबूती से पकड़ लीजिए। कुरआन में हर तरक्की का रास्ता मौजूद है। कोई भी इंसान पैगंबर-ए-आज़म हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के बताए रास्ते पर चलकर दुनिया और अखिरत की कामयाबी हासिल कर सकता है। हमें कुरआन व हदीस को पढ़ने के बाद उस पर अमल भी करना चाहिए क्योंकि अमल के बगैर इल्म बेकार है। पैगंबर-ए-आज़म हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम, अहले बैत, सहाबा व औलिया-ए-किराम की जिंदगी को अपना आदर्श बनाइए तभी कामयाबी मिलेगी।

नौजवानाने अहले सुन्नत कमेटी की ओर से इस्लामाबाद गोरखनाथ में जलसा-ए-ईद मिलादुन्नबी हुआ। जिसमें मौलाना जैनुल आबेदीन व कारी रमज़ान अली ने कहा कि सारे पैगंबर अल्लाह के महबूब बंदे हैं। हम सब अल्लाह के बंदे हैं। अल्लाह ही इबादत का हक़दार है। दूसरा कोई इबादत के लायक़ नहीं, हम सब उसकी मख़लूक़ हैं, वो हमारा ख़ालिक है, वो अपने बंदों पर रहमान व रहीम है। अल्लाह एक और अकेला है। न कोई उसका बेटा है। न वो किसी से पैदा हुआ है, न कोई उसके बराबर है। किसी को अल्लाह का बेटा, भाई या रिश्तेदार मानना कुफ्र है।

सारे पैगंबर अल्लाह के महबूब बंदे हैं : कारी रमज़ान अली

अल्लाह का कोई शरीक नहीं, न जात में, न सिफ़ात में, न अफ़आल में, न अहकाम में, न अस्मा में। अल्लाह ने मुसलमानों को दीन-ए-इस्लाम के वसूलों पर चलने का हुक्म दिया है। दीन-ए-इस्लाम के वसूल मतलब कुरआन और पैगंबर-ए-आज़म हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के बताये गए रास्ते हैं। पैगंबर-ए-आज़म की पाक जिंदगी इंसानियत के लिए एक बेहतरीन मिसाल है, जिससे पूरी दुनिया एक अच्छी और मिसाली जिन्दगी गुजारने का सबक हासिल करती रही है।

अंत में सलातो सलाम पढ़कर मुल्कों मिल्लत के लिए दुआ की गई। शीरीनी बांटी गई। जलसे में मुनाजिर हसन, मौलाना अली अहमद बरकाती, हाफिज अज़ीम अहमद नूरी, हाफिज अब्दुल लतीफ, हाफिज इरफान रज़ा, मौलाना तफज्जुल हुसैन, हाफिज शहादत हुसैन, मौलाना मो. शाबान, तौफीक अहमद, इम्तियाज अहमद, बरकत हुसैन, मुहर्रम अली, हैदर अली, कादिर अली, जलालुद्दीन, हाफिज मो. आरिफ रज़ा आदि मौजूद रहे।

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