‘इल्म का दरिया ताजुश्शरिया’ के नारों से गूंज उठा मौलवी चक बड़गो

अकीदत के साथ मनाया गया हुजूर ताजुश्शरिया का उर्स-ए-पाक

गोरखपुर। तंजीम कारवाने अहले सुन्नत की ओर से विश्वविख्यात इस्लामिक विद्वान हुजूर ताजुश्शरिया हजरत मुफ्ती मो. अख्तर रज़ा खां अजहरी मियां अलैहिर्रहमां का पहला सालाना उर्स-ए-पाक रविवार को अकीदत व एहतराम के साथ मौलवी चक बड़गो में मनाया गया। इस दौरान भव्य जलसा हुआ।

जिसमें मुख्य अतिथि मुफ्ती-ए-आज़म महराष्ट्र मुफ्ती मो. मुजीब अशरफ रज़वी ने कहा कि हुज़ूर ताजुश्शरिया की गिनती विश्व के प्रसिद्ध आलिमों में होती है। हुज़ूर ताजुश्शरिया अल अजहर यूनिवर्सिटी मिस्र के टॉपर थे। वर्ष 1966 में जब अल अज़हर यूनिवर्सिटी मिस्र से फ़ारिग हुए तो कर्नल अब्दुल नासिर ने आपको बतौर इनाम ज़ामे अज़हर अवार्ड पेश किया साथ ही साथ सनद से भी नवाज़ा। हुजूर ताजुश्शरिया इल्म का दरिया थे। जिनके फैसले पर अहले सुन्नत व जमात के तमाम उलेमा अपने इत्मिनान का इज़हार करते थे।

हुजूर ताजुश्शरिया ने पूरी ज़िन्दगी अल्लाह व पैगंबर-ए-आज़म हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की पैरवी व फरमाबरदारी में गुजारी। आप पैगंबर-ए-आज़म हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम पर जानों दिल से फ़िदा व क़ुर्बान थे। आप शरीअत व सुन्नत के जबरदस्त आलिम थे। सहाबा-ए-किराम और अहले बैत के सच्चे आशिक थे। आप ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन हज़रत अबूबक्र, हज़रत उमर, हज़रत उस्मान व हज़रत अली के सच्चे जांनिसार थे। कुल मिलाकर एक वली की हर खूबी हुजूर ताजुश्शरिया में कूट-कूट कर भरी हुई थी।

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आपने वर्ष 2000 में बरेली में इस्लामिक स्टडीज़ जमीयतुर रज़ा के नाम से एक इस्लामी धर्मशास्त्र केंद्र की स्थापना की थी। विज्ञान, धर्म और दर्शन सहित कई विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला पर कई किताबें लिखीं। अज़हरुल फ़तवा के खिताब से फ़तवा का संग्रह उनका विशाल कार्य है। उन्हें अरबी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, हिंदी भाषा पर अच्छी पकड़ थी। दीनी तब्लीग के लिए विश्व के हर देश में तशरीफ ले गए।

विशिष्ट अतिथि घोसी मऊ के मौलाना इफ्तेखार नदीम ने कहा कि हुजूर ताजुश्शरिया ने आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खां अलैहिर्रहमां की अरबी ज़बान में लिखी कई किताबों का उर्दू में अनुवाद करके अवाम तक पहुँचया। वहीं स्वयं लिखी किताबों से तमाम मसलों का हल निकालकर रहनुमाई फरमाई।

ताजुश्शरिया

सदरुल उलमा हज़रत तहसीन रज़ा खां के विसाल के बाद उलेमाओं का ठिकाना हुजूर ताजुश्शरिया का दर हो गया था। हुजूर ताजुश्शरिया पेचीदा मसलों का हल निकाला करते थे। आपके इल्म का लोहा सभी मानते थे। आपकी मक़बूलियत व इल्मी मज़बूती का इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वर्ष 2012 में सऊदी सरकार ने खुद दावत देकर हुजूर ताजुश्शरिया को ग़ुस्ल-ए-काबा शरीफ की रस्म अदायगी में शामिल किया था।

विशिष्ट वक्ता मुफ्ती मो. अजहर शम्सी ने कहा कि हुजूर ताजुश्शरिया पूरी ज़िन्दगी दिखावे के तामझाम से काफी दूर रहकर बस और बस मसलके आला हजरत की तरक़्क़ी के लिए जी जान से लगे रहे। आपने पैगंबर-ए-आज़म हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की बारगाह में नात-ए-पाक का नज़राना भी पेश किया। जिसमें मुनव्वर मेरी आँखों को मेरे शम्सुद्दुहा कर दें, ने खूब शोहरत पाई। भारत, मिस्र, साउथ अफ्रीका, ब्रिटेन, अमेरिका, सऊदी अरब, नेपाल, मॉरीशस, पाकिस्तान, बांग्लादेश के अलावा दुनिया भर मे आपके करोड़ों की तादाद में मुरीद हैं।

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हुजूर ताजुश्शरिया वर्ष 2011 में अमेरिका की जार्ज टॉउन यूनिवर्सिटी के इस्लामिक क्रिश्चियन अंडरस्टेंडिंग सेंटर की ओर से किए जाने वाले सर्वे में 28वां स्थान पर आए। इसके अलावा जॉर्डन की रॉयल इस्लामी स्ट्रेजिक स्टडीज़ सेंटर के वर्ष 2014-15 के सर्वे में उन्हें 22वें स्थान पर रखा गया। पिछले साल उनका जुलाई माह में उनका विसाल हो गया।

तिलावत कारी मो. उस्मान बरकाती ने की। अध्यक्षता मुफ्ती खुर्शीद अहमद मिस्बाही ने व संचालन मौलाना मो. राशिद रज़ा अमजदी ने किया। नात शरीफ मौलाना शादाब अहमद, मौलाना मो. तालीम रज़ा निज़ामी व अफरोज ने पेश की। अंत में कुल शरीफ की रस्म अदा की गई। सलातो सलाम पढ़कर दुआ मांगी गई। शीरीनी बांटी गई।

इस मौके पर मुफ्ती अख्तर हुसैन मन्नानी, कारी मो. अनीस अहमद, मौलाना तालिब रज़ा, तौहीद आलम, जकी अहमद, इमरान, सद्दाम हुसैन, गोल्डी, मनोव्वर अहमद, नसीर, हनीफ, अब्दुल रहीम, फैजी, शमीम, रमज़ान अली, सैयद अब्दुल्लाह, अलाउद्दीन निज़ामी, मो. कलीम अशरफ, अरशद खान सहित तमाम अकीदतमंदों की सहभागिता रही।

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