लखनऊ में नीति निर्माताओं के साथ मासिक धर्म (Periods) के दौरान स्वच्छता को लेकर हुई संगोश्ठी

मासिक धर्म

मासिक धर्म (Periods) के दौरान स्वच्छता के बारे में कम बातचीत कररने की समस्या का समाधान खोजने के लिए यौन प्रजनन स्वास्थ्य अधिकारों के क्षेत्र में अग्रणी चेंज मेकर और नीति निर्माताओं के साथ किया गया संवाद

लखनऊ। यूथ की आवाज (वाईकेए) ने उर्दू अकादमी में मासिक धर्म (Periods) के दौरान स्वच्छता को लेकर जागरूकता कायम करने के लिए इस क्षेत्र में प्रमुख चेंज मेकर और नीति निर्माताओं के साथ यौन प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार को समर्पित पहली संगोश्ठी आयोजित की।

2014 के एक अध्ययन के अनुसार, यह अनुमान लगाया गया है कि सालाना लगभग दो करोड़ तीस लाख लड़कियाँ मासिक धर्म (Periods) स्वच्छता प्रबंधन सुविधाओं की कमी के कारण स्कूल छोड़ देती हैं, जिसमें सैनिटरी नैपकिन (Sanitary Napkin) की उपलब्धता और मासिक धर्म की तार्किक जागरूकता की कमी शामिल है। मासिक धर्म (Periods), एसआरएचआर, और मासिक धर्म स्वच्छता लिंग असमानता, स्वास्थ्य जोखिम और पर्यावरणीय क्षति के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है।

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इस संगोश्ठी में प्रोजेक्ट खेल के कार्यकारी निदेशक अंगना प्रसाद, मासिक धर्म स्वच्छता चैंपियन शिकोह जैदी, उत्तर प्रदेश सरकार की हाउसिंग की विषेश सचिव अपूर्वा डब, गाँव कनेक्शन की वरिष्ठ रिपोर्टर नीतू सिंह, पंचायतीराज विभाग के राज्य आईईसी सलाहकार संजय सिंह चौहान उपस्थित थे। वे एमएचएम के विभिन्न पहलुओं में बदलाव और यौन प्रजनन स्वास्थ्य अधिकारों के बारे में संवाद का नेतृत्व कर रहे थे।

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परियोजना खेल के कार्यकारी निदेशक अंगना प्रसाद ने कहा, ‘‘पीरियड्स (Periods) सामान्य और स्वाभाविक प्रक्रिया है और निश्चित रूप से यह कोई ‘बीमारी’ नहीं है। इस बात को समझना जरूरी है कि कई महिलाओं ने अपने पीरियड्स (Periods) के लिए कोड नाम ‘समस्या’ शब्द का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, जबकि अगर हम स्वास्थ्य के लिहाज से बात करें तो पीरियड्स (Periods) आना समस्या नहीं है बल्कि पीरियड्स (Periods) नहीं आना समस्या है। पीरियड्स (Periods) को सामान्य मानने में मदद करने के लिए लोगों को अधिक सकारात्मक तरीके से व्यवहार करने की आवश्यकता है।’’

लखनऊ के मासिक धर्म (Periods) स्वच्छता के क्षेत्र में काम करने वाले शिकोह जैदी ने कहा, ‘‘मैंने अपने स्कूल में लड़कियों का एक छोटा समूह बनाया है जो अपने समुदाय में जागरूकता अभियान चला रही हैं। आज, मासिक धर्म में स्वच्छता की कमी के कारण सालाना दो करोड़ 30 लाख लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं। और भारत में केवल 12 प्रतिषत महिलाएँ ही सैनिटरी नैपकिन (Sanitary Napkin) का उपयोग करती हैं। यह पीरियड्स और माहवारी को लेकर चुप्पी तोड़ने का समय है।

यूथ की आवाज के संस्थापक और निदेशक अंशुल तिवारी ने कहा, ‘‘संगोश्ठी का उद्देष्य हमेशा से ही हमारी दुनिया को आकार देने वाले कुछ सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत शुरू करने का रहा है। इस आयोजन में 5 प्रभावषाली वक्ता और चेंज मेकर एक मंच पर उपस्थित होकर मासिक धर्म (Periods) स्वच्छता प्रबंधन के स्टीरियोटाइप को तोड़ दिया और अधिक प्रभाव पैदा करने के लिए बातचीत को एक नई दिशा प्रदान किया। इस संगोश्ठी को लेकर दर्शकों से भारी प्रतिक्रिया प्राप्त हुई और हमें उम्मीद है कि यह पहल आगे बढ़ेगी।’’

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