मुगल बादशाह हजरत औरंगजेब आलमगीर का उर्स-ए-पाक मनाया गया

हिन्दुस्तान के अज़ीम बादशाह हजरत औरंगजेब आलमगीर ने एक फकीर की तरह बड़ी सादा जिंदगी गुजारी : मुफ्ती मो. अजहर शम्सी

गोरखपुर । नार्मल स्थित दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद अलैहिर्रहमां की मस्जिद में गुरुवार को बाद नमाज असर मुगल बादशाह हजरत औरंगजेब आलमगीर अलैहिर्रहमां का उर्स-ए-पाक अकीदत से मनाया गया। फातिहा व दुआ ख्वानी की गई।

इस मौके पर मुफ्ती मो. अजहर शम्सी ने कहा कि हिन्दुस्तान के अज़ीम बादशाह हजरत औरंगजेब आलमगीर ने एक फकीर की तरह बड़ी सादा जिंदगी गुजारी। टोपियों के पल्ले में बुके लगाकर उसको बेचकर, और अपने हाथ से क़ुरआन-ए-पाक लिखकर उसको हदिया करते और उन दोनों की आमदनी से अपना निज़ी खर्च पूरा करते थे। आपने मौत के वक्त वसीयत कर दी थी कि चार रुपए दो आने जो मैंने टोपियां बनाकर कमाए हैं। वह मेरे कफन पर खर्च हों और रकम जो मैंने कुरआन शरीफ की किताबत कर के हासिल किए हैं वह गरीबों में खैरात कर दिए जाए।

आप की अहद हुकूमत में बेशुमार मस्जिदें तामिर हुए और दीन-ए-इस्लाम को फैलने का मौका खूब मिला। अपने कार्यों की आसानी के लिए कानून-ए-शरीयत की एक ज़ख़ीम किताब तैयार कराई जिसका नाम ‘फतावा आलमगीरी’ है। आपने इस किताब की तैयारी के लिए 500 काबिल उलेमा-ए-किराम की एक जमात कायम की और शाही खजाने से उनका वजीफा तय किया। आठ साल की मेहनत के बाद यह किताब तैयार हुई और इसकी तैयारी में दो लाख रुपये खर्च हुए। इस कारनामा की बदौलत आपकी अज़मत का झंडा आज भी हिंदुस्तान से मिस्र तक लहरा रहा है।

आपके दौरे हुकूमत में मुसलमानों के साथ गैर मुस्लिम रियाया भी सुख और चैन की जिंदगी गुजारती रही। मुलाज़मत का दरवाजा अपने सबके लिए एक सा खोल रखा था। आपकी हिमायत वफादारी में जिस तरह ईरान और तुरान के मुसलमान अपनी शमशीरों के जौहर दिखाते थे। यूं ही आप के झंडे तले हिंदुस्तान के हजारों राजपूत सिपाही और अफसरों भी आपके दुश्मन पर तलवारें चलाते रहें। आपकी सल्तनत का रकबा बहुत फैला था। हिंदुस्तान, अफगानिस्तान और तिब्बत इन तीनों मुल्क के आप वाहिद बादशाह थे। आपने 50 साल 1 माह 15 दिन हुकूमत की। आपकी दरगाह खुल्दाबाद (औरंगाबाद) में है। आप एक कामिल दरवेश व जिंदा वली थे।

अध्यक्षता करते हुए मौलाना मकसूद आलम मिस्बाही ने कहा कि हजरत औरंगजेब आलमगीर ने अपने जमाने के बड़े-बड़े उलेमा से तालीम हासिल की। आपको अरबी, फारसी, हिंदी, तुर्की भाषा का ज्ञान था। आप बड़े आलिम होने के साथ हाफिज-ए-कुरआन भी थे। दीनी तालीम के साथ फौजी तालीम में भी महारत हासिल की। जंगी दांव पेंच में आप एक बहुत बेहतरीन सिपहसालार थे। बचपन ही में आप रोजा, नमाज वगैरह अहकाम-ए- शरीयत के सख्त पाबंद थे।

उन्होंने कहा कि हजरत औरंगजेब सबसे ज्यादा होशियार, संजीदा, बुरदबार, जफ़ा कश, तजुर्बाकार, बहादुर और पुख्ता किरदार थे। इन बातों के साथ आप दीन के आलिम-ए-शरीयत के हामी, पाकीज़ा चाल-चलन के आईंनादार थे। बादशाह होते ही आपने शराब, भांग, गांजा, नाचगाने पर पाबंदी लगा दी। आपने बादशाहत इसलिए कुबूल की थी ताकि रियाया अमन व सुकून की जिंदगी बसर करें। नाजायज टैक्स का बोझ आवाम के कंधे से उतार दिया जाए। मुल्क में अदल व इंसाफ का झंडा लहराया ताकि ताकत वाले कमजोरों पर जुल्म ना कर पाएं। प्रजा की सिर से तकरीबन 80 टैक्स माफ कर दिए।

रास्ते और सड़कों को हिफाजत का उम्दा इंतजाम करके तिजारत को खूब बढ़ावा दिया। अपने अदल व इंसाफ का ऐसा मजबूत शामियाना ताना जिसके नीचे भेड़िया भी एक दुबली कमजोर बकरी पर हमला करने की हिम्मत ना कर सकता था। अपने मुल्क में तालीम को खूब तरक्की दी। मदरसों पर जमीन वक्फ की। फरियादियों, दुखियों और मजलूमों के लिए आप का वजूद रहमत-ए-इलाही का दरिया था।

दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद नार्मल की मस्जिद में हजरत औरंगजेब आलमगीर अलैहिर्रहमां का उर्स-ए-पाक मनाया गया।
दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद नार्मल की मस्जिद में हजरत औरंगजेब आलमगीर अलैहिर्रहमां का उर्स-ए-पाक मनाया गया।

इस मौके पर कारी महबूब रज़ा, कारी कैसर रज़ा, हाजी मो. कलीम, अब्दुल्लाह, हाजी इशा मोहम्मद, अब्दुल अजीज, मो. अशरफ रजा, शाह आलम, गुलाम वारिस, मो. आतिफ रजा, जमशेद अहमद, सूफी शहाबुद्दीन आदि लोग मौजूद रहे।

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