हम क्यों मनायें अंग्रेजी नव वर्ष

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आलेख – चन्द्रपाल प्रजापति 

न ऋतु बदली  न मौसम , न कक्षा बदली  न सत्र,  न फसल बदली न खेती,  न पेड़ पौधों की रंगत,  न सूर्य चाँद सितारों की दिशा,  ना ही नक्षत्र। 1 जनवरी आने से पहले ही सब नववर्ष की बधाई देने लगते हैं। मानो कितना बड़ा पर्व है। अंग्रेजी नव वर्ष अर्थात एक जनवरी आने से पहले ही जगह जगह जश्न मनाने की तैयारियां प्रारम्भ हो जाती हैं। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के होर्डिंग, बैनर, पोस्टर व कार्डो के साथ दारू की दुकानों की भी चाँदी कटने लगती है। कहीं कहीं तो दारू का दौर इतना चल जाता है कि घटनायें दुर्घटनाओं मे बदल जाती हैं।

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हम भारतीय भी पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण मे इतने सरोबार हो जाते हैं कि हमे उचित अनुचित का बोध नही रह जाता है। हम अपनी सभी सांस्कृतिक मर्यादाओं को भूल जाते हैं। और हम अपने भारतीय नववर्ष को भुला बैठे हैं  जो विक्रमी संवत वर्ष प्रतिपदा को प्रारम्भ होता है और मार्च और अप्रैल के मध्य आता है। जहां चारो तरफ भक्तिमय वातावरण रहता है। जहां अंग्रेजी नववर्ष पर आलस्यमय वातावरण रहता है और चारो तरफ कोहरामय वातावरण रहता है। वहीं भारतीय नव वर्ष पर वातावरण सुखमय रहता है। चारो तरफ पेड़ पौधे हरे भरे हो जाते हैं। जहां अंग्रेजी नव वर्ष पर कोई भी शुभ कार्य विवाह आदि नही होते हैं। किसानों के पास कुछ भी धनधान्य नही होता है जिससे वो नववर्ष मना सके। और भारतीय नववर्ष के उपरांत सभी शुभ कार्य प्रारंभ हो जाते हैं। किसानों के पास धनधान्य का भंडार हो जाता है और वो नववर्ष हर्षोउल्लास से मनाता है।

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जब ब्रह्माण्ड से लेकर सूर्य चाँद की दिशा, मौसम, फसल, कक्षा, नक्षत्र, पौधों की नई पत्तिया, किसान की नई फसल, विद्यार्थी की नई कक्षा, मनुष्य में नया रक्त संचरण आदि परिवर्तन होते है। जो विज्ञान आधारित है ।अपनी मानसिकता को बदले । विज्ञान आधारित भारतीय काल गणना को पहचाने। स्वयं सोचे की क्यों मनाये हम 1 जनवरी को नया वर्ष? केवल कैलेंडर बदलें अपनी संस्कृति नहीं आओ जागें  जगायें, भारतीय संस्कृति अपनायें और आगे बढ़े। एक जनवरी को अंग्रेजी कलेंडर की तारीख और अंग्रेज मानसिकता के लोगो के अलावा कुछ नही बदला, अपना नव संवत्सर ही नया साल है I

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