गौरी लंकेश हत्याकांड के आरोपी श्रीकांत पांगारकर का नाम एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।

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गौरी लंकेश हत्याकांड के आरोपी श्रीकांत पांगारकर का नाम एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। इस बार वजह उनके हाल ही में हुए निकाय चुनाव में जीत हासिल करना है। पांगारकर पहले ही पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के मामले में आरोपी हैं, और इस मामले की सुनवाई अभी भी अदालत में जारी है। लेकिन इस चुनावी सफलता ने राजनीतिक और सामाजिक दोनों ही स्तरों पर हलचल मचा दी है।पत्रकारिता और लोकतंत्र के लिए यह खबर गंभीर चिंता का विषय बन गई है। ऐसे व्यक्ति का स्थानीय प्रशासन में पहुंचना समाज में सवाल खड़ा करता है कि क्या कानून की निगरानी में भी आरोपी व्यक्ति राजनीतिक पद पर आसीन हो सकता है। गौरी लंकेश की हत्या की साजिश के आरोप के बावजूद पांगारकर की जीत ने लोगों के बीच असमंजस और नाराजगी पैदा कर दी है। कई पत्रकारों और नागरिक समाज के संगठनों ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा बताया है।इस मामले ने कानूनी और राजनीतिक दोनों ही विमर्श को सक्रिय कर दिया है। चुनाव आयोग और न्यायपालिका पर भी नजरें टिकी हुई हैं कि क्या वे ऐसे मामलों में उचित कार्रवाई करेंगे या नहीं। भारतीय लोकतंत्र में किसी आरोपी को चुनाव लड़ने और जीतने का अधिकार है, लेकिन जब वह किसी गंभीर अपराध में आरोपी हो, तो यह व्यवस्था और भी विवादास्पद बन जाती है।गौरी लंकेश, जो अपनी निर्भीक और सशक्त पत्रकारिता के लिए जानी जाती थीं, ने भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ लगातार आवाज उठाई। उनकी हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था और यह मामला लंबे समय तक मीडिया और अदालत में सुर्खियों में रहा। ऐसे में पांगारकर का चुनाव जीतना समाज में कई तरह के सवाल खड़ा करता है—क्योंकि यह सीधे तौर पर न्याय और राजनीतिक शक्ति के बीच टकराव को दिखाता है।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पांगारकर की जीत स्थानीय वोट बैंक की संरचना और क्षेत्रीय राजनीति की जटिलताओं का परिणाम भी हो सकती है। वहीं सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार इस बात को लेकर चिंतित हैं कि यह लोकतंत्र में अपराधियों के लिए भी राजनीतिक अवसर की गुंजाइश बढ़ा सकता है। इस घटना ने यह भी स्पष्ट किया है कि राजनीतिक प्रक्रिया और कानून के बीच संतुलन बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।इस मुद्दे ने जनता के बीच भी बहस छेड़ दी है। कुछ लोग इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा मान रहे हैं, जबकि कई लोग इसे न्याय और नैतिकता के नजरिए से खतरनाक मान रहे हैं। इस खबर ने एक बार फिर से यह सवाल उठाया है कि क्या अपराध में आरोपी व्यक्ति को राजनीतिक जिम्मेदारी निभाने की अनुमति मिलनी चाहिए।अंततः, श्रीकांत पांगारकर की निकाय चुनाव जीत ने एक संवेदनशील मुद्दा सामने रखा है—कानून, न्याय और लोकतंत्र के बीच संतुलन। यह मामला न केवल गौरी लंकेश की हत्या की याद दिलाता है, बल्कि समाज और मीडिया के लिए यह भी एक चेतावनी है कि लोकतंत्र में जिम्मेदारी और नैतिकता का महत्व हमेशा बना रहना चाहिए।

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