
तुलसी केवट!संस्कार न्यूज़ /सीधी शहर के बीचों-बीच स्थित लालता चौक हर सुबह एक अनौपचारिक मजदूर मंडी में तब्दील हो जाता है। सूरज निकलते ही हजारों की संख्या में मजदूर यहां इकट्ठा होने लगते हैं। इनमें बड़ी संख्या में आदिवासी मजदूर शामिल होते हैं, जो अपने परिवार का पेट पालने के लिए दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं। रोजी-रोटी की आस में ये मजदूर घंटों इंतजार करते हैं कि कोई उन्हें काम पर ले जाए।इस मजदूर मंडी में मजदूरों की खुलेआम बोली लगाई जाती है। काम देने वाले लोग आते हैं और मजदूरों से मोल-भाव करते हैं। कोई 300 रुपये में पूरा दिन काम कराने की बात करता है तो कोई इससे भी कम दाम तय करता है। मजबूरी इतनी ज्यादा होती है कि मजदूर कम मजदूरी पर भी काम करने को तैयार हो जाते हैं। कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि मजदूरों को उनकी मेहनत के अनुरूप मेहनताना तक नहीं मिल पाता।स्थानीय मजदूरों के अनुसार, प्रतिदिन 1000 से 1200 से अधिक मजदूर लालता चौक पहुंचते हैं, लेकिन सभी को काम मिल पाना संभव नहीं हो पाता। कई मजदूर पूरे दिन इंतजार करने के बाद भी खाली हाथ लौटने को मजबूर होते हैं। जिनको काम मिल भी जाता है, उनके साथ काम के घंटे, मजदूरी और सुविधाओं को लेकर कोई लिखित समझौता नहीं होता, जिससे शोषण की आशंका बनी रहती है।सरकार द्वारा मनरेगा, कौशल विकास योजनाएं और रोजगार गारंटी जैसे कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, लेकिन इन योजनाओं का लाभ इन मजदूरों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पा रहा है। मजदूरों का कहना है कि या तो उन्हें योजनाओं की जानकारी नहीं है या फिर कागजी प्रक्रियाएं इतनी जटिल हैं कि वे इसका लाभ नहीं उठा पाते।सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि जब तक स्थानीय स्तर पर स्थायी रोजगार के अवसर नहीं सृजित किए जाएंगे और मजदूरों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं किया जाएगा, तब तक स्थिति में सुधार संभव नहीं है। लालता चौक पर लगने वाली यह मजदूर मंडी सरकार और प्रशासन के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा करती है, जो विकास के दावों की सच्चाई को उजागर करती है।आज जरूरत है कि सरकार योजनाओं को केवल कागजों तक सीमित न रखकर उन्हें प्रभावी ढंग से जमीन पर उतारे, ताकि आदिवासी मजदूरों को सम्मानजनक रोजगार और बेहतर जीवन मिल सके।
