
अजय त्रिपाठी!संस्कार न्यूज़ /मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सीधी जिले के एक सिविल जज के आचरण पर कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए एक अहम आदेश पारित किया है। हाईकोर्ट ने 13 साल से लंबित एक सिविल मामले को संबंधित न्यायालय से हटाकर दूसरे कोर्ट में स्थानांतरित करने के निर्देश दिए हैं। यह फैसला न्यायिक आदेशों की अवहेलना और मामले में अनावश्यक देरी को लेकर लिया गया है।दरअसल, यह सिविल प्रकरण पिछले 13 वर्षों से सीधी जिले की एक सिविल कोर्ट में लंबित था। मामले की लंबी अवधि को देखते हुए हाईकोर्ट ने पहले ही स्पष्ट निर्देश दिए थे कि इस केस का निपटारा छह सप्ताह के भीतर किया जाए, ताकि पक्षकारों को जल्द न्याय मिल सके। लेकिन हाईकोर्ट के निर्देशों के बावजूद संबंधित सिविल जज ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख जानबूझकर सात सप्ताह बाद तय कर दी।हाईकोर्ट ने इसे न्यायिक अनुशासन का गंभीर उल्लंघन माना है। कोर्ट का कहना है कि जब किसी मामले में उच्च न्यायालय समय-सीमा तय करता है, तो अधीनस्थ न्यायालयों का कर्तव्य होता है कि वे उसका पूरी निष्ठा से पालन करें। निर्देशों की अनदेखी न केवल न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती है, बल्कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करती है।मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सिविल जज के रवैये पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह का आचरण स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने माना कि इससे यह संकेत मिलता है कि प्रकरण को अनावश्यक रूप से लंबित रखने की मंशा थी। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने केस को तुरंत प्रभाव से दूसरे सक्षम कोर्ट में ट्रांसफर करने का आदेश दिया।इसके साथ ही हाईकोर्ट ने नए कोर्ट को भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वह इस सिविल केस की सुनवाई तेजी से करते हुए तय समय-सीमा में इसका निपटारा सुनिश्चित करे। कोर्ट ने यह भी कहा कि लंबे समय से लंबित मामलों में देरी न्याय से वंचित करने के समान है।हाईकोर्ट का यह आदेश न सिर्फ संबंधित मामले के पक्षकारों के लिए राहत भरा है, बल्कि यह एक स्पष्ट संदेश भी देता है कि न्यायिक आदेशों की अवहेलना किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस फैसले से यह उम्मीद की जा रही है कि निचली अदालतों में लंबित मामलों के निपटारे की प्रक्रिया और अधिक जिम्मेदारी व पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ेगी।
